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हुका-काशी: कोलकाता का जापानी जासूस

एक बँगला किताब मँगवायी हमने— “हुका-काशी समग्र।” नाम सुनकर कोई भी सोचेगा— “हुका-काशी?” क्या बला है यह? अभी दो-तीन हफ्ते पहले तक हम भी इस नाम से अनजान थे। हम नेट पर अक्सर बँगला किशोर साहित्य के बारे में खोज-बीन करते हैं, मगर कभी यह नाम मेरे सामने नहीं आया था। मनोरंजन भट्टाचार्य का नाम भी कभी मेरे सामने नहीं आया था। कोई तीन हफ्ते पहले एकाएक ये दोनों नाम मेरे सामने उभरे। हमने इन दोनों नामों के बारे में कुछ और जानकारियाँ हासिल कीं और उसके बाद अमेजन से इस किताब को मँगवाया।

चूँकि मेरा कार्यक्रम उत्तर प्रदेश में आने का बना हुआ था, इसलिए यहीं के पते पर हमने इसे मँगवाया। परसों हम यहाँ पहुँचे, तो यह किताब यहाँ मेरे इन्तजार में रखी हुई थी। किताब के लेखक हैं— मनोरंजन भट्टाचार्य (1903-1939) और प्रकाशक हैं— भाषा वेंचर प्रा. लि., कोलकाता- 29। किताब का मुद्रण शानदार है। जो पार्सल हमें मिला, ऐसा लगा कि उसे किसी ने बड़े जतन से पैक किया था। पहले पॉलिथीन की थैली, फिर बहुत ही करीने से लपेटा गया अखबार और अन्त में पार्सल वाला लिफाफ।

खैर, तो “हुका-काशी” एक जापानी जासूस का नाम है, जो कोलकाता में रहते हैं। स्वभाव से वे इतने धीर-गम्भीर हैं कि खुद लेखक कहानियों में उनके लिए ‘आप’ का प्रयोग करते हैं। हुका-काशी में कोई आडम्बर नहीं है। पिस्तौल तो छोड़िए, एक लाठी तक उन्होंने अपने किसी कारनामे में नहीं चलायी है। हाँ, एकाध बार युयुत्सु का दाँव-पेंच उन्हें चलना पड़ा है। (अभी तक 5 कहानियाँ हम पढ़ चुके हैं, उनमें यह मौका नहीं मिला है उन्हें।) वे जटिल गुत्थियों का हल दिमागी विश्लेषण से करते हैं, यानि उन्हें The Grey Matter Detective कहा जा सकता है। अब तक पढ़ी गयी पाँचों कहानियों में हमने पाया कि रहस्य का बारह आना (तीन चौथाई) अंश वे घटनास्थल के निरीक्षण के दौरान ही हल कर लेते हैं, केवल बाकी बचे चार आना (एक चौथाई) के लिए उन्हें थोड़ी भाग-दौड़ करनी पड़ती है।

1928 में मनोरंजन भट्टाचार्य ने इस किरदार को गढ़ा था। उन दिनों यह किरदार लोकप्रिय भी हुआ था। हुका-काशी को पसन्द करने वालों में शरदिन्दु बन्द्योपाध्याय (ब्योमकेश बक्शी के प्रणेता) और सत्यजीत राय (फेलू’दा के स्रष्टा) भी थे। हो सकता है कि बाद के दिनों में ब्योमकेश बक्शी और फेलू’दा को तड़क-भड़क से रहित बनाने के पीछे इन दोनों लेखकों के दिमाग में हुका-काशी की ही छवि रही हो।

मनोरंजन भट्टाचार्य ने हुका-काशी की कुल 5 कहानियाँ और 3 उपन्यास लिखे हैं। वे अपने समय में किशोर साहित्य के एक लोकप्रिय लेखक हुआ करते थे। उन्होंने बहुत सारी हास्यकथाएं लिखी हैं। आज मनोरंजन भट्टाचार्य का नाम करीब-करीब भुला दिया गया है। नयी पीढ़ी वाले तो हुका-काशी के नाम से अपरिचित हैं ही, पुरानी पीढ़ी वाले भी हुका-काशी को याद नहीं करते हैं। ऐसे में, 2022 में इस पुस्तक को प्रकाशित कर ‘भाषा’ वालों ने वाकई सराहनीय काम किया है। किताब हर तरह से परफेक्ट बन पड़ी है, लेकिन किताब की एक बात का जिक्र हम यहाँ खास तौर पर करना चाहेंगे। आवरण पर किताब के शीर्षक के ऊपर लेखक का नाम छपा हुआ है और इसी तरह शीर्षक से नीचे “छवि: देवाशीष देव” छपा हुआ है। पहली बार हम किसी किताब को चित्रकार का नाम इतने सम्मान के साथ लेते हुए देख रहे हैं। वर्ना अभी तक तो हमने यही देखा है कि कहानियों एवं आवरण के चित्रकार के नाम को छोटे अक्षरों में ‘टाईटल वर्सो’ पेज पर छाप दिया जाता है— मानो खानापूरी की जा रही है। कहने की जरुरत नहीं, चित्रकार देवाशीष देव ने कहानियों और आवरण के लिए आकर्षक शैली में चित्र बनाये हैं, जो बाल-किशोरों को लुभायेंगे।

हाँ, एक और बात— किताब के साथ एक छोटा-सा नोटपैड भी उपहार के रूप में मिला है। नोटपैड के आवरण पर भी किताब के आवरण चित्र को छापा गया है।

चित्रकार ने अपने चित्रांकन में हुका-काशी को 40-45 के अधेड़ के रूप में चित्रित किया है। हम ऐसा नहीं करेंगे। हम जब इन कहानियों का अनुवाद पेश करेंगे, तो हम हुका-काशी को चुस्त-दुरुस्त जासूस के रूप में पेश करेंगे, उम्र उनकी ज्यादा-से-ज्यादा पैंतीस रखेंगे। फिलहाल चैट जीपीटी से हमने एक चित्र बनवा भी लिया है।

समग्र की पाँचों कहानियाँ पढ़ चुके हैं, अब तीन उपन्यासों की बारी है। ‘पद्मराग’ उपन्यास शुरू किये हैं, रहस्य की शुरुआत हो चुकी है, अभी तक लेकिन हुका-काशी का प्रवेश नहीं हुआ है। अभी कहानी में रणजीत का जिक्र है। रणजीत हुका-काशी के सहयोगी हैं।

हुका-काशी के 3 उपन्यास: 1. पद्मराग, 2. घोष चौधरी की घड़ी और 3. सोने का हिरण

हुका-काशी की 5 कहानियाँ: 1. हीरक रहस्य, 2. तेरह नम्बर मकान का रहस्य, 3. शान्तिधाम की अशान्ति, 4. संसक्तपुर का रहस्य और 5. चण्डेश्वरपुर का रहस्य

—जयदीप शेखर, 23 अगस्त, 2026 (फेसबुक पर)

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वेबसाइट को फिर खोला गया

जगप्रभा की ई’पुस्तकों को अमेजन पर उपलब्ध कराने के बाद इस वेबसाइट को बन्द कर दिया गया था। आज इसे फिर से खोला गया। अब ऐसा है कि ई’पुस्तकों के आवरण चित्रों पर क्लिक करने आपको अमेजन पर ले जाया जायेगा, जहाँ आप ई’पुस्तकों को खरीद सकते हैं। आप चाहें, तो अमेजन किण्डल की मासिक सदस्यता लेकर इन ई’पुस्तकों को मुफ्त में भी पढ़ सकते हैं।

-जयदीप शेखर, 21 जनवरी, 2026

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लालू की तीन शरारतें

एक लम्बे अरसे के बाद जगप्रभा पर एक ई’पुस्तक जोड़ी जा रही है- “लालू की शरारतें।” बँगला के सर्वश्रेष्ठ लेखक माने जाने वाले शरत् चन्द्र चट्टोपाध्याय की लिखी लालू की तीन कहानियाँ इसमें शामिल हैं।

पिछले कुछ समय से हम “बनफूल” की 30 कहानियों के अनुवाद में लगे हुए थे। वह काम पूरा हुआ। अब मेरे पास बनफूल की 100 कहानियों का अनुवाद मौजूद हो गया है। हमने एक बड़े प्रकाशक को यह बताते हुए सम्पर्क किया। उनसे “डाना” का भी जिक्र किया। उन्होंने रुचि दिखायी तो है, पाण्डुलिपियाँ उन्हें भेज भी दी गयी हैं, अब आगे देखा जाय।

इस काम के बाद हमें जगप्रभा के काम में लगना था, लेकिन उसी समय लखनऊ से एक फोन आया कि बाल-किशोर कहानियों का एक बड़ा संग्रह तैयार किया जा रहा है, जिसमें देश की विभिन्न भाषाओं से भी कुछ बाल-किशोर कहानियाँ शामिल रहेंगी। मुझसे बँगला से 5 कहानियों का अनुवाद भेजने के लिए कहा गया। हमने शरत् चन्द्र चट्टोपाध्याय, विभूतिभूषण बन्द्योपाध्याय, राजशेखर बसु (परशुराम), सुकुमार राय और हेमेन्द्र कुमार राय की एक-एक बाल-किशोर कहानियों का अनुवाद करके उन्हें भेज दिया। इसमें शरत् चन्द्र रचित लालू की दूसरी कहानी हमने उन्हें भेजी। तभी हमें ध्यान आया कि क्यों न बँगला के सर्वश्रेष्ठ लेखक की एक ई’पुस्तक जगप्रभा पर भी हो। तो लगे हाथ हमने लालू की बाकी दोनों कहानियों का भी अनुवाद कर डाला और इस तरह से लालू की तीनों कहानियों को एक ई’पुस्तक के रूप में प्रस्तुत कर दिया।

-जयदीप

25.09.2024

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‘वीरान टापू का खजाना’- ‘साहित्य विमर्श’ पर

जैसा कि बताया जा चुका है, ‘जगप्रभा’ की कुछ ई’पुस्तकों को ‘साहित्य विमर्श’ द्वारा मुद्रित पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है; उसी कड़ी में ‘वीरान टापू का खजाना’ उनकी ओर से प्रकाशित हो चुका है।

यह बिभूतिभूषण बन्द्योपध्याय द्वारा रची एक साहसिक गाथा है। बँगला लेखक बिभूतिभूषण बन्द्योपध्याय के प्रति हम हिन्दीभाषियों की आम धारणा क्या है? सामाजिक उपन्यासों के एक लेखक की। हम बस उन्हें “पथेर पाँचाली” के लेखक के रूप में जानते हैं; लेकिन ऐसा नहीं है। उन्होंने उच्चस्तरीय साहसिक गाथाएं और परालौकिक कहानियाँ भी लिखी हैं। उन सबका हिन्दी अनुवाद कर हम हिन्दीभाषियों के बीच बनी उनकी छवि को एक नया दृष्टिकोण देना चाहते हैं।

साहसिक गाथाओं की “त्रयी” पूरी हो गयी। पहली गाथा- “चाँद का पहाड़”, दूसरी गाथा- “सुन्दरबन में सात साल” और अब तीसरी साहसिक गाथा- “वीरान टापू का खजाना” भी प्रकाशित हो गयी। ये विश्वस्तरीय साहसिक गाथाएं हैं। किशोरों-नवयुवाओं के लिए must-read हैं। इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि हिन्दीभाषी अब तक इनसे अनजान थे!

कहानी की पृष्ठभूमि है— सुलू सागर! हममें से कितने परिचित हैं इससे? बहुत कम। बोर्नियो और फिलीपीन्स द्वीपसमूह के बीच यह सागर है। इसके उत्तर में दक्षिणी चीन सागर है और दक्षिण में सुलावेसी सागर। आज से 40-50 साल पहले इसे रहस्यमयी सागर माना जाता था। यहाँ बहुत सारे ऐसे द्वीप हैं, जो घने जंगलों से ढके हुए हैं।

ऐसे ही एक द्वीप में है, 9वीं सदी, या शायद इससे भी पहले की एक नगरी के ध्वंसावशेष और उनके बीच छुपा है एक खजाना। मनीला के जुए के अड्डे के एक अन्धेरे कमरे में मरणासन्न दक्षिण-भारतीय बूढ़ा नाविक नटराजन— जो कभी समुद्री लुटेरा रह चुका होता है— अपनी काँपती आवाज में यह बात जहाज के एक खलासी जमातुल्ला को बताता है। कुछ समय बाद जमातुल्ला कोलकाता में सुशील को यह बात बताता है। सुशील अपने ममेरे भाई सनत और जमातुल्ला को साथ लेकर निकल पड़ता है उस अनजाने टापू की खोज में। दूसरी तरफ, एक गुप्त संगठन है, जो इस ‘पवित्र’ खजाने की रक्षा के लिए मलय “बोलो” (बड़े हँसुए-जैसा हथियार) से किसी का भी सिर धड़ से अलग कर देने के लिए उद्यत रहता है। इस कारण सिंगापुर में वे अपने दल में शामिल करते हैं पूर्व जलदस्यु यार हुसैन को उसके कुछ शागिर्दों के साथ। इन सबको उस टापू तक पहुँचाता है एक अनुभवी चीनी मल्लाह, अपने “जंक” से। “चीनी जंक” से आप परिचित हैं?

कुल-मिलाकर, एक रोमांचक दास्तान। पढ़ा जाय और बिभूतिभूषण-जैसे महान लेखक के सामने नतमस्तक हुआ जाय ऐसी उच्चस्तरीय साहसिक गाथाएं लिखने के लिए!

साहित्य विमर्श पर “वीरान टापू का खजाना”: https://www.sahityavimarsh.in/veeraan-tapu-ka-khazana/

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दिगम्बर जेठू की आत्मकथा- ‘मेरी जीवनयात्रा’

जिन लोगों को लिखने का थोड़ा-सा भी शौक है, वे अगर अपने जीवन के उत्तरार्ध में भूली-बिसरी बातों को याद कर डायरी में लिखा करें, तो यह एक रोचक आत्मकथा बन सकती है।

बचपन में मैंने अपने मँझले नानाजी से यह अनुरोध किया था, क्योंकि मुझे पता चला था कि वे कभी कविताएं लिखते थे। कुछ कविताएं उन्होंने मुझे दिखायी थीं, जिनमें से एक देश के प्रथम आम चुनाव पर लिखी हुई थी। खैर, उन्होंने कोई डायरी नहीं लिखी।

बाद में पिताजी के दो मित्रों से (दोनों ने सरकारी सेवाओं से अवसर ग्रहण कर रखा था और अपनी युवावस्था में साहित्यिक गतिविधियों में थोड़ी-बहुत रुचि रखते थे) भी मैंने ऐसा अनुरोध किया था, जिनमें से एक दिगम्बर जेठू ने- बेशक, बहुत देर करके- बीते दिनों की बातों को याद करके लिखना शुरू किया। आश्चर्यजन रूप से, मात्र पाँच महीनों में ही उन्होंने अच्छी-खासी रोचक आत्मकथा लिख डाली! वे चाहते, तो हिन्दी या अँग्रेजी में भी लिख सकते थे, लेकिन बँगला में उनका भाषा-प्रवाह बेहतर होना था, इसलिए उन्होंने बँगला में ही लिखा और मुझसे कहा कि बाद में मैं इसे हिन्दी में लिख दूँ। यह 2020 की बात है।

चूँकि मैं बँगला टाईप करना नहीं जानता था, अतः उनकी पाण्डुलिपि को मालदा (पश्चिम बँगाल का शहर, जो झारखण्ड में स्थित हमारे कस्बे से सवा सौ किमी दूर है) भेजवाया गया। वहाँ से उनकी बँगला आत्मकथा (“आमार यात्रापथ”) अप्रैल 2021 में छपकर आयी- पहले हफ्ते के किसी दिन। उन दिनों वे अस्वस्थ चल रहे थे। 9 अप्रैल को उन्हें बेहतर चिकित्सा के लिए मालदा ले जाना तय हुआ, इसलिए 8 की शाम उन्होंने मुझे फोन किया। मैं उस दिन एक पड़ोसी कस्बे में गया हुआ था, जहाँ मेरे फोन की बैटरी समाप्त हो गयी थी। रात 9 बजे करीब घर आकर जब मैंने फोन को चार्ज पर लगाया, तब पता चला कि उनकी 16 मिस्ड कॉल थीं! मैं भागा-भागा उनके घर पहुँचा। उन्होंने बँगला आत्मकथा की एक प्रति मुझे दी और इसका हिन्दी अनुवाद करने की जिम्मेवारी मुझे सौंपी।

अगले दिन बेहतर चिकित्सा के लिए उन्हें मालदा ले जाया गया, वहाँ से कोलकाता रेफर कर दिया गया और 24 अप्रैल के दिन वे सदा के लिए हम लोगों को छोड़ गये।

अपनी आत्मकथा का हिन्दी अनुवाद वे नहीं देख पाये। इस बात का मलाल मुझे हमेशा रहेगा। खैर, पिताजी के एक अन्य मित्र काली काकू ने मेरे अनुवाद को पढ़ा और मन्तव्य किया कि दिगम्बर हिन्दी में लिखता, तो ऐसा ही लिखता। मुझे सन्तोष हुआ।

उसी हिन्दी आत्मकथा (“मेरी जीवनयात्रा”) के eBook संस्करण को जगप्रभा पर उपलब्ध किया जा रहा है।

विशेष: आत्मकथा के आवरण के लिए दिगम्बर जेठू ने एक दृश्य की कल्पना की थी, मैंने उस कल्पना के आधार पर एक स्केच बनाया था और फिर हमारे कस्बे के एक चित्रकार- जो अब कोलकाता में रहते हैं- प्रशान्त चौधरी ने उस स्केच के आधार पर जलरंग से एक सुन्दर कलाकृति बना दी। हालाँकि पुस्तक के मुद्रित संस्करण पर जेठू के एक नाती द्वारा बनायी गयी कलाकृति को स्थान दिया गया है, उसने भी उसी स्केच के आधार पर जलरंग बनाया था।  

(जेठू- ताऊजी, काकू- चाचाजी)

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कमरा नम्बर- 2

गुजरात के एक सज्जन तपन कुमार भट्ट साहब से दो बार फोन पर बातचीत हुई है। वे एडवेंचर, डिटेक्टिव और मिस्ट्री वाली कहानियों के न केवल पाठक हैं, बल्कि इनके संग्रहकर्ता भी हैं। पिछली बातचीत में उन्होंने ही मुझे बताया था कि विभूतिभूषण बन्द्योपाध्याय की ‘हीरा माणिक ज्वले’ एक साहसिक गाथा है, नहीं तो शीर्षक पढ़कर मैं इसे समाजिक उपन्यास समझ रहा था। (जानकारी मिलने के बाद बाकायदे मैंने इसका अनुवाद किया और निकट भविष्य में यह अनुवाद ‘वीरान टापू का खजाना’ शीर्षक से ‘साहित्य विमर्श’ द्वारा प्रकाशित हो सकता है। सुलू सागर के एक वीरान टापू पर खजाने की खोज की यह रोमांचक साहसिक गाथा है।) हाल की बातचीत में उन्होंने बताया कि ब्योमकेश बक्शी की दर्जन भर कहानियों का हिन्दी अनुवाद नहीं हुआ है। उन्होंने उन कहानियों की सूची भेजी है और वे चाहते हैं कि मैं उनका अनुवाद करूँ। मैंने उनसे कहा कि ठीक है, ‘कमरा नम्बर- 2’ कहानी से मैं यह शुरुआत करता हूँ।

कुमार-बिमल शृंखला की कहानी ‘अफ्रिका अभियान’ के बाद अब मुझे जयन्त-माणिक शृंखला की कहानी ‘शनि-मंगल का रहस्य’ का अनुवाद करना था, लेकिन इससे पहले ‘कमरा नम्बर- 2’ का अनुवाद मैंने पूरा कर लिया है, क्योंकि कहानी बहुत लम्बी नहीं थी।

दूसरी बात। पता चल रहा है कि किन्हीं प्रबीर चक्रवर्ती के पास शरदिन्दु बन्द्योपध्याय की रचनाओं के स्वत्वाधिकार हैं, लेकिन उनका कोई सम्पर्क सूत्र नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में उन्हें सूचित किये बिना और उनसे अनुमति लिये बिना मैं इस कहानी को प्रस्तुत कर रहा हूँ। किसी तरह की आपत्ति होने पर इसे हटा लिया जायेगा। तब ब्योमकेश बक्शी की कहानियों के हिन्दी अनुवाद को इस वेबसाइट पर 2030 के बाद ही प्रस्तुत किया जा सकेगा।

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कुमार-बिमल का अगला अभियान

कुमार-बिमल शृंखला की अगली कहानी ‘अफ्रिका अभियान’ प्रस्तुत कर दी गयी है। हेमेन्द्र कुमार राय ने ‘यक्ष का खजाना’ के बाद (इस शृंखला की) जो दो कहानियाँ लिखी थीं, उनमें कुमार-बिमल पहले तो मंगल ग्रह के अन्तरिक्षयात्रियों के साथ मंगल ग्रह पर जा पहुँचते हैं और जब वापस लौटते हैं, तो धरती के एक ऐसे अनजान हिस्से पर उतरते हैं, जहाँ डायनासोरों की दुनिया कायम होती हैं। मैंने इन दोनों कहानियों को फिलहाल छोड़ दिया है- कभी बाद में इनका अनुवाद किया जायेगा। मैंने इनके बाद वाली कहानी को अनुवाद के लिए चुना, जिसमें कुमार-बिमल अफ्रिका के एक रोमांचक अभियान पर निकले हुए हैं।  


इस बार से ‘फोण्ट’ में बदलाव किया जा रहा है।

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“बनफूल” की भी कुछ रचनाएं

“बनफूल” (1899-1979) बँगला साहित्य के लब्धप्रतिष्ठित लेखक रहे हैं। उनका रचना-भण्डार बहुत विशाल है और उनमें विविधता भी बहुत है। बेशक, बाल-किशोरों के लिए भी उन्होंने बहुत-सी कहानियाँ लिखी हैं- हो सका, तो उन्हें कभी यहाँ प्रस्तुत भी किया जायेगा, लेकिन फिलहाल उनकी कुछ कहानियों, एक लघु उपन्यास और एक वृहत् उपन्यास के हिन्दी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे हैं।

एक तो अनुवादक “बनफूल” को अपने इलाके का लेखक मानते हैं और दूसरे, अनुवादक का मानना है कि “बनफूल”-जैसे विलक्षण प्रतिभा के धनी लेखक को जो सम्मान एवं लोकप्रियता मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिल पायी है। इस कारण अनुवादक उन्हें इस वेबसाइट में शामिल कर रहे हैं।

एक और बात है- भविष्य में इस वेबसाइट पर रहस्य-रोमांच से भरपूर कहानियों का जखीरा इकट्ठा होने वाला है। इससे एक तरह की ‘एकरसता’ पैदा हो सकती है, ऐसे में “बनफूल” की रचनाएं स्वाद बदलने के काम आयेंगी।


मैंने कोलकाता के तीन प्रकाशकों (कहानियों के प्रकाशक- ग्रन्थालय, कोल- 7, ‘भुवन सोम’ के प्रकाशक- बाणीशिल्प, कोल- 9 और ‘डाना’ के प्रकाशक- दे’ज पब्लिशिंग, कोल- 73) तथा “बनफूल” के पौत्र (श्री महिरूह मुखर्जी) को ई’मेल भेजकर उनसे इन रचनाओं के Translation Rights माँगे हैं और यह कहा है कि इसके लिए जो License Fee चुकाना होगा, वह चुकाया जायेगा। अगर सकारात्मक जवाब आता है और लाइसेन्स फी चुकाना मेरे बस में होता है, तो कोई बात नहीं और अगर जवाब नकारात्मक आता है, तो इन अनुवादों को वेबसाइट से हटाना पड़ जायेगा।

—जयदीप शेखर

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विभूतिभूषण के किशोर उपन्यास

विभूतिभूषण वन्द्योपाध्याय (1894-1950) की गिनती बँगला के महान लेखकों में होती है। उनकी रचना ‘पथेर पाँचाली’ (रास्ते का गीत, 1929) एक प्रसिद्ध उपन्यास है, जिस पर सत्यजीत राय ने विश्वप्रसिद्ध फिल्म (1955) बनायी थी। विभूतिभूषण ने बँगाल के ग्राम्य जीवन से पात्रों को लेकर सामाजिक उपन्यासों की रचना की है, लेकिन किशोरों के मन में साहस का संचार करने के लिए उन्होंने तीन साहसिक (Adventure) उपन्यासों की भी रचना की है- 1. चाँदेर पाहाड़, 2. सुन्दरबने सात बत्सर (इस गाथा की शुरुआत भुवनमोहन राय ने की थी) और 3. हीरा माणिक ज्वले। इसके अलावे उन्होंने सात पारलौकिक (Supernatural) कहानियाँ भी लिखी हैं, जिनमें ‘तारानाथ तांत्रिक’ की दो कहानियाँ प्रसिद्ध हैं।

मैंने उपर्युक्त सभी रचनाओं का हिन्दी अनुवाद कर लिया है। पारलौकिक कहानियों को छोड़ बाकी अनुवादों के कभी ई-बुक भी तैयार किये थे, लेकिन बाद में ‘साहित्य विमर्श’ द्वारा इनमें रुचि दिखाने के बाद मैंने वे सभी ई-बुक हटा लिये हैं और अब ‘साहित्य विमर्श’ एक-एक कर इन अनुवादों को मुद्रित पुस्तक के रूप में प्रकाशित कर रहा है।

अभी तक निम्न दो पुस्तकें ‘साहित्य विमर्श’ द्वारा प्रकाशित की जा चुकी हैं:-

  1. ‘चाँदेर पाहाड़’ का अनुवाद ‘चाँद का पहाड़’ नाम से। देखने/ खरीदने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें।
  2. ‘सुन्दरबने सात बत्सर’ का अनुवाद ‘सुन्दरबन में सात साल’ नाम से। देखने/खरीदने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें।

निकट भविष्य में ‘हीरा माणिक ज्वले’ का अनुवाद ‘वीरान टापू का खजाना’ नाम से और परालौकिक कहानियों का संग्रह ‘तारानाथ तांत्रिक एवं अन्य परालौकिक कहानियाँ’ नाम से प्रकाशित हो सकती हैं।

टिप्पणी: मैंने ‘चाँद का पहाड़’ का जो ई-बुक तैयार किया था, उसमें मूल बँगला पुस्तक (1937) में शामिल श्यामल कृष्ण बसु द्वारा बनाये गये 15 चित्रों को भी शामिल किया था। इसी प्रकार, ‘सुन्दरबन में सात साल’ के ई-बुक में मूल बँगला पुस्तक (1952 वाले संस्करण के लिए) के लिए हितेन्द्र मोहन बसु द्वारा बनाये गये 35 चित्रों को शामिल किया था। अफसोस, कि ये चित्र (किसी कारण से) इन अनुवादों के मुद्रित संस्करण में नहीं आ पाये हैं। ‘चाँद का पहाड़’ के परिशिष्ट में मैंने अपनी ओर से कुछ रोचक जानकारियाँ भी दी थीं, जो कहानी की कुछ बातों से जुड़ी थीं।  

इति,

—जयदीप शेखर

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स्वागत

हेमेन्द्र कुमार राय (1888-1963) द्वारा बँगला में रची गयी साहसिक, जासूसी एवं परालौकिक (डरावनी एवं भूतिया) कहानियों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है। एक-एक कर उनकी कहानियों का हिन्दी अनुवाद किया जाना है। इसी वजह से इस वेबसाइट को बनाया गया है। जो पाठक उनकी इन रोचक एवं रोमांचक कहानियों को पढ़ना चाहें, वे इस वेबसाइट पर अपना खाता बना सकते हैं और नयी कहानी के आते ही उन्हें खरीद सकते हैं। फिलहाल ये कहानियाँ eBook (PDF) के रूप में ही उपलब्ध रहेंगी।

बेशक, कुछ अन्यान्य रचनाएं भी यहाँ उपलब्ध रहेंगी, लेकिन मुख्य रूप से हेमेन्द्र कुमार राय की कहानियों के हिन्दी अनुवाद के लिए ही इस वेबसाइट को बनाया गया है।

— जयदीप शेखर