Posted on Leave a comment

वेबसाइट को फिर खोला गया

जगप्रभा की ई’पुस्तकों को अमेजन पर उपलब्ध कराने के बाद इस वेबसाइट को बन्द कर दिया गया था। आज इसे फिर से खोला गया। अब ऐसा है कि ई’पुस्तकों के आवरण चित्रों पर क्लिक करने आपको अमेजन पर ले जाया जायेगा, जहाँ आप ई’पुस्तकों को खरीद सकते हैं। आप चाहें, तो अमेजन किण्डल की मासिक सदस्यता लेकर इन ई’पुस्तकों को मुफ्त में भी पढ़ सकते हैं।

-जयदीप शेखर, 21 जनवरी, 2026

Posted on Leave a comment

तीन-चार महीनों की बन्दी…

जगप्रभा की वेबसाइट को 1 अक्तूबर 2024 से तीन या चार महीनों के लिए बन्द रखा जायेगा। इस दौरान जगप्रभा की सारी ई’पुस्तकें अमेजन पर “KDP Select” के अन्तर्गत उपलब्ध रहेंगी।

यह एक प्रयोग होगा। तीन-चार महीने बाद परिणाम के विश्लेषण के आधार पर फिर अगला निर्णय लिया जायेगा।

-जयदीप

27 सितम्बर 2024

Posted on Leave a comment

फेलू’दा पर एक आलेख

इस बात का जिक्र करना हम भूल गये थे कि फेलू’दा पर लिखा हुआ मेरा एक आलेख “अहा जिन्दगी” के ताजा अंक (ऑनलाईन संस्करण) में प्रकाशित हुआ है।

बीते अगस्त में ही एक ई’मेल आया था कि क्या जासूस फेलू’दा पर ऐसा एक लेख लिखा जा सकता है, जो किशोरों के लिए प्रेरणादायी भी हो? हमने कहा- लिखा जा सकता है।

फिर हमने इस तरह का एक आलेख तैयार कर उन्हें भेज दिया। बाद में उस आलेख को संक्षिप्त भी किया, क्योंकि आलेख को दो हजार शब्दों की सीमा के अन्दर बाँधना था।

वह आलेख सितम्बर में प्रकाशित हुआ और हमें इसका उचित पारिश्रमिक भी मिला।

“अहा जिन्दगी” के प्रति आभार।

उस आलेख को इन दो चित्रों में पढ़ा जा सकता है:

(उनका एक एप भी है।)

-जयदीप

25.09.2024

Posted on Leave a comment

लालू की तीन शरारतें

एक लम्बे अरसे के बाद जगप्रभा पर एक ई’पुस्तक जोड़ी जा रही है- “लालू की शरारतें।” बँगला के सर्वश्रेष्ठ लेखक माने जाने वाले शरत् चन्द्र चट्टोपाध्याय की लिखी लालू की तीन कहानियाँ इसमें शामिल हैं।

पिछले कुछ समय से हम “बनफूल” की 30 कहानियों के अनुवाद में लगे हुए थे। वह काम पूरा हुआ। अब मेरे पास बनफूल की 100 कहानियों का अनुवाद मौजूद हो गया है। हमने एक बड़े प्रकाशक को यह बताते हुए सम्पर्क किया। उनसे “डाना” का भी जिक्र किया। उन्होंने रुचि दिखायी तो है, पाण्डुलिपियाँ उन्हें भेज भी दी गयी हैं, अब आगे देखा जाय।

इस काम के बाद हमें जगप्रभा के काम में लगना था, लेकिन उसी समय लखनऊ से एक फोन आया कि बाल-किशोर कहानियों का एक बड़ा संग्रह तैयार किया जा रहा है, जिसमें देश की विभिन्न भाषाओं से भी कुछ बाल-किशोर कहानियाँ शामिल रहेंगी। मुझसे बँगला से 5 कहानियों का अनुवाद भेजने के लिए कहा गया। हमने शरत् चन्द्र चट्टोपाध्याय, विभूतिभूषण बन्द्योपाध्याय, राजशेखर बसु (परशुराम), सुकुमार राय और हेमेन्द्र कुमार राय की एक-एक बाल-किशोर कहानियों का अनुवाद करके उन्हें भेज दिया। इसमें शरत् चन्द्र रचित लालू की दूसरी कहानी हमने उन्हें भेजी। तभी हमें ध्यान आया कि क्यों न बँगला के सर्वश्रेष्ठ लेखक की एक ई’पुस्तक जगप्रभा पर भी हो। तो लगे हाथ हमने लालू की बाकी दोनों कहानियों का भी अनुवाद कर डाला और इस तरह से लालू की तीनों कहानियों को एक ई’पुस्तक के रूप में प्रस्तुत कर दिया।

-जयदीप

25.09.2024

Posted on Leave a comment

जगप्रभा की ई-पुस्तकों का फिर से मूल्य-निर्धारण

जगप्रभा की ई-पुस्तकों का फिर से मूल्य-निर्धारण किया गया है। पहले पृष्ठ-संख्या के आधार पर मूल्य-निर्धारण किया गया था, इस बार कहानियों की शब्द-संख्या को आधार बनाया गया है।

दूसरी बात, वेबसाइट पर ई-पुस्तकों को उनके निर्धारित मूल्य पर ही उपलब्ध रखा गया है (कुछ ही ई-पुस्तकें पहले की तरह 30/- पर उपलब्ध हैं।) निर्धारित मूल्य पर ई-पुस्तक खरीदने के बाद पाठक कभी भी, किसी भी डिवाइस पर “My Account” टैब पर जाकर खरीदी गयी ई-पुस्तक को (PDF) “डाउनलोड” कर सकेंगे।

जो पाठक “बिना डाउनलोड” किये ई-पुस्तकें पढ़ना चाहें, उनके लिए 30/- प्रति ई-पुस्तक का शुल्क बरकरार रखा जा रहा है। वेबसाइट के निचले हिस्से में इसकी जानकारी उपलब्ध है।

इति।

-जयदीप, 26 जून 2024  

Posted on Leave a comment

फिलहाल ‘बनफूल’ की कहानियाँ…

पिछले कुछ समय से जगप्रभा की वेबसाइट पर कोई नयी eBook नहीं आ रही है।

इसका कारण यह है कि फिलहाल मैं ‘बनफूल’ की 30 कहानियों का अनुवाद कर रहा हूँ।

‘बनफूल’ की 70 कहानियों का अनुवाद किया हुआ है, 30 और कहानियों का अनुवाद पूरा हो जाने के बाद— मेरी इच्छा है कि 100 कहानियों के इस संग्रह को हिन्दी का कोई बड़ा प्रकाशक प्रकाशित करे।

एक नामचीन प्रकाशक से मैंने सम्पर्क किया है, नमूने के तौर पर 5 अनूदित कहानियाँ उन्होंने मँगवायी भी है। आगे देखा जाय…

-जयदीप, 12.6.2024

Posted on Leave a comment

तारिणी चाचा के लोमहर्षक किस्से

तारिणी चाचा एक किस्सागो हैं। चार-बच्चों के एक समूह को वे अक्सर किस्से सुनाते हैं। उनका कहना है कि कहानी कहने के आर्ट के चलते थोड़ी-बहुत कल्पना का इस्तेमाल करना पड़ता है, वर्ना सारे किस्से सच्चे हैं। बच्चों को जानकारी मिलती है कि तरिणी चाचा ने काम-धन्धे के सिलसिले में सारा भारतवर्ष छान मारा है और इस दौरान विभिन्न प्रकार के अनुभव उन्होंने प्राप्त किये हैं।

तारिणी चाचा के किस्सों में रहस्य-रोमांच भरपूर होता है, किस्सों के शीर्षक से ही इसका अनुमान लगाया जा सकता है- डुमनीगढ़ का आदमखोर, कॉन्वे कैसल की प्रेतात्मा, तारिणी चाचा और बेताल, लखनऊ का द्वन्दयुद्ध (Duel), धूमलगढ़ का हॉण्टिंग लॉज, तारिणी और इन्द्रजाल, नरिस साहब का बँगला, इत्यादि। दर्जन भर से ज्यादा किस्से हैं उनके।

तारिणी चाचा का यह किरदार सत्यजीत राय ने गढ़ा है। बेशक, यह किरदार फेलू’दा और प्रो. शंकु जितना लोकप्रिय नहीं है, लेकिन ये किस्से रहस्य-रोमांच के मामले में कहीं से उन्नीस नहीं हैं।

योजना है कि तारिणी चाचा के सारे किस्सों का धीरे-धीरे अनुवाद कर लेने के बाद किसी प्रकाशक से सम्पर्क किया जायेगा। चूँकि सत्यजीत राय की रचनाएं कॉपीराइट के दायरे में आती हैं, इसलिए जगप्रभा की वेबसाइट पर इन्हें बिक्री के लिए नहीं रखा जा सकता। वेबसाइट के अन्तिम हिस्से में ऐसे (कॉपीराइट वाले) अनुवादों की एक सूची है, उसी में इन किस्सों के अनुवादों को जोड़ा जायेगा। इच्छुक पाठक/प्रकाशक इन्हें पढ़ने/प्रकाशित करने (जरूरी अनुमति हासिल करते हुए) के लिए [email protected] पर सम्पर्क कर सकते हैं।

आज तारिणी चाचा का पहला किस्सा “डुमनीगढ़ का आदमखोर” इस सूची में शामिल किया जा रहा है।

-जयदीप

01 फरवरी 2024   

Posted on Leave a comment

‘वीरान टापू का खजाना’- ‘साहित्य विमर्श’ पर

जैसा कि बताया जा चुका है, ‘जगप्रभा’ की कुछ ई’पुस्तकों को ‘साहित्य विमर्श’ द्वारा मुद्रित पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है; उसी कड़ी में ‘वीरान टापू का खजाना’ उनकी ओर से प्रकाशित हो चुका है।

यह बिभूतिभूषण बन्द्योपध्याय द्वारा रची एक साहसिक गाथा है। बँगला लेखक बिभूतिभूषण बन्द्योपध्याय के प्रति हम हिन्दीभाषियों की आम धारणा क्या है? सामाजिक उपन्यासों के एक लेखक की। हम बस उन्हें “पथेर पाँचाली” के लेखक के रूप में जानते हैं; लेकिन ऐसा नहीं है। उन्होंने उच्चस्तरीय साहसिक गाथाएं और परालौकिक कहानियाँ भी लिखी हैं। उन सबका हिन्दी अनुवाद कर हम हिन्दीभाषियों के बीच बनी उनकी छवि को एक नया दृष्टिकोण देना चाहते हैं।

साहसिक गाथाओं की “त्रयी” पूरी हो गयी। पहली गाथा- “चाँद का पहाड़”, दूसरी गाथा- “सुन्दरबन में सात साल” और अब तीसरी साहसिक गाथा- “वीरान टापू का खजाना” भी प्रकाशित हो गयी। ये विश्वस्तरीय साहसिक गाथाएं हैं। किशोरों-नवयुवाओं के लिए must-read हैं। इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि हिन्दीभाषी अब तक इनसे अनजान थे!

कहानी की पृष्ठभूमि है— सुलू सागर! हममें से कितने परिचित हैं इससे? बहुत कम। बोर्नियो और फिलीपीन्स द्वीपसमूह के बीच यह सागर है। इसके उत्तर में दक्षिणी चीन सागर है और दक्षिण में सुलावेसी सागर। आज से 40-50 साल पहले इसे रहस्यमयी सागर माना जाता था। यहाँ बहुत सारे ऐसे द्वीप हैं, जो घने जंगलों से ढके हुए हैं।

ऐसे ही एक द्वीप में है, 9वीं सदी, या शायद इससे भी पहले की एक नगरी के ध्वंसावशेष और उनके बीच छुपा है एक खजाना। मनीला के जुए के अड्डे के एक अन्धेरे कमरे में मरणासन्न दक्षिण-भारतीय बूढ़ा नाविक नटराजन— जो कभी समुद्री लुटेरा रह चुका होता है— अपनी काँपती आवाज में यह बात जहाज के एक खलासी जमातुल्ला को बताता है। कुछ समय बाद जमातुल्ला कोलकाता में सुशील को यह बात बताता है। सुशील अपने ममेरे भाई सनत और जमातुल्ला को साथ लेकर निकल पड़ता है उस अनजाने टापू की खोज में। दूसरी तरफ, एक गुप्त संगठन है, जो इस ‘पवित्र’ खजाने की रक्षा के लिए मलय “बोलो” (बड़े हँसुए-जैसा हथियार) से किसी का भी सिर धड़ से अलग कर देने के लिए उद्यत रहता है। इस कारण सिंगापुर में वे अपने दल में शामिल करते हैं पूर्व जलदस्यु यार हुसैन को उसके कुछ शागिर्दों के साथ। इन सबको उस टापू तक पहुँचाता है एक अनुभवी चीनी मल्लाह, अपने “जंक” से। “चीनी जंक” से आप परिचित हैं?

कुल-मिलाकर, एक रोमांचक दास्तान। पढ़ा जाय और बिभूतिभूषण-जैसे महान लेखक के सामने नतमस्तक हुआ जाय ऐसी उच्चस्तरीय साहसिक गाथाएं लिखने के लिए!

साहित्य विमर्श पर “वीरान टापू का खजाना”: https://www.sahityavimarsh.in/veeraan-tapu-ka-khazana/

Posted on Leave a comment

एच.पी. लवक्राफ्ट

एच.पी. लवक्राफ्ट डरावनी एवं अजीबो-गरीब (horror and weird) कहानियों के प्रसिद्ध अमरीकी लेखक रहे हैं। कहानियाँ तो उनकी बहुत सारी हैं, लेकिन ज्यादातर की शैली एवं विषयवस्तु ऐसी नहीं है कि हिन्दीभाषी किशोर पाठक उन्हें पसन्द कर सकें। फिर भी इच्छा है कि उनकी विश्वप्रसिद्ध कहानी “द कॉल ऑव कथुलू” का हिन्दी अनुवाद किया जाय। किसी ने हिन्दी अनुवाद किया है, लेकिन मुझे पढ़ते वक्त कुछ कमी महसूस हुई— उस कमी को दूर करते हुए हम खुद अनुवाद करना चाहेंगे, ताकि पढ़ते वक्त ऐसा लगे कि हम हिन्दी की कोई मौलिक कहानी पढ़ रहे हैं।

“कथुलू” का अनुवाद करने से पहले अभ्यास के तौर पर उनकी दो अन्य कहानियों का अनुवाद करना हमने तय किया है। इसी फैसले के तहत उनकी कहानी “द कर्स ऑव यिग” का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है।

-जयदीप अगस्त 2023