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हुका-काशी: कोलकाता का जापानी जासूस

एक बँगला किताब मँगवायी हमने— “हुका-काशी समग्र।” नाम सुनकर कोई भी सोचेगा— “हुका-काशी?” क्या बला है यह? अभी दो-तीन हफ्ते पहले तक हम भी इस नाम से अनजान थे। हम नेट पर अक्सर बँगला किशोर साहित्य के बारे में खोज-बीन करते हैं, मगर कभी यह नाम मेरे सामने नहीं आया था। मनोरंजन भट्टाचार्य का नाम भी कभी मेरे सामने नहीं आया था। कोई तीन हफ्ते पहले एकाएक ये दोनों नाम मेरे सामने उभरे। हमने इन दोनों नामों के बारे में कुछ और जानकारियाँ हासिल कीं और उसके बाद अमेजन से इस किताब को मँगवाया।

चूँकि मेरा कार्यक्रम उत्तर प्रदेश में आने का बना हुआ था, इसलिए यहीं के पते पर हमने इसे मँगवाया। परसों हम यहाँ पहुँचे, तो यह किताब यहाँ मेरे इन्तजार में रखी हुई थी। किताब के लेखक हैं— मनोरंजन भट्टाचार्य (1903-1939) और प्रकाशक हैं— भाषा वेंचर प्रा. लि., कोलकाता- 29। किताब का मुद्रण शानदार है। जो पार्सल हमें मिला, ऐसा लगा कि उसे किसी ने बड़े जतन से पैक किया था। पहले पॉलिथीन की थैली, फिर बहुत ही करीने से लपेटा गया अखबार और अन्त में पार्सल वाला लिफाफ।

खैर, तो “हुका-काशी” एक जापानी जासूस का नाम है, जो कोलकाता में रहते हैं। स्वभाव से वे इतने धीर-गम्भीर हैं कि खुद लेखक कहानियों में उनके लिए ‘आप’ का प्रयोग करते हैं। हुका-काशी में कोई आडम्बर नहीं है। पिस्तौल तो छोड़िए, एक लाठी तक उन्होंने अपने किसी कारनामे में नहीं चलायी है। हाँ, एकाध बार युयुत्सु का दाँव-पेंच उन्हें चलना पड़ा है। (अभी तक 5 कहानियाँ हम पढ़ चुके हैं, उनमें यह मौका नहीं मिला है उन्हें।) वे जटिल गुत्थियों का हल दिमागी विश्लेषण से करते हैं, यानि उन्हें The Grey Matter Detective कहा जा सकता है। अब तक पढ़ी गयी पाँचों कहानियों में हमने पाया कि रहस्य का बारह आना (तीन चौथाई) अंश वे घटनास्थल के निरीक्षण के दौरान ही हल कर लेते हैं, केवल बाकी बचे चार आना (एक चौथाई) के लिए उन्हें थोड़ी भाग-दौड़ करनी पड़ती है।

1928 में मनोरंजन भट्टाचार्य ने इस किरदार को गढ़ा था। उन दिनों यह किरदार लोकप्रिय भी हुआ था। हुका-काशी को पसन्द करने वालों में शरदिन्दु बन्द्योपाध्याय (ब्योमकेश बक्शी के प्रणेता) और सत्यजीत राय (फेलू’दा के स्रष्टा) भी थे। हो सकता है कि बाद के दिनों में ब्योमकेश बक्शी और फेलू’दा को तड़क-भड़क से रहित बनाने के पीछे इन दोनों लेखकों के दिमाग में हुका-काशी की ही छवि रही हो।

मनोरंजन भट्टाचार्य ने हुका-काशी की कुल 5 कहानियाँ और 3 उपन्यास लिखे हैं। वे अपने समय में किशोर साहित्य के एक लोकप्रिय लेखक हुआ करते थे। उन्होंने बहुत सारी हास्यकथाएं लिखी हैं। आज मनोरंजन भट्टाचार्य का नाम करीब-करीब भुला दिया गया है। नयी पीढ़ी वाले तो हुका-काशी के नाम से अपरिचित हैं ही, पुरानी पीढ़ी वाले भी हुका-काशी को याद नहीं करते हैं। ऐसे में, 2022 में इस पुस्तक को प्रकाशित कर ‘भाषा’ वालों ने वाकई सराहनीय काम किया है। किताब हर तरह से परफेक्ट बन पड़ी है, लेकिन किताब की एक बात का जिक्र हम यहाँ खास तौर पर करना चाहेंगे। आवरण पर किताब के शीर्षक के ऊपर लेखक का नाम छपा हुआ है और इसी तरह शीर्षक से नीचे “छवि: देवाशीष देव” छपा हुआ है। पहली बार हम किसी किताब को चित्रकार का नाम इतने सम्मान के साथ लेते हुए देख रहे हैं। वर्ना अभी तक तो हमने यही देखा है कि कहानियों एवं आवरण के चित्रकार के नाम को छोटे अक्षरों में ‘टाईटल वर्सो’ पेज पर छाप दिया जाता है— मानो खानापूरी की जा रही है। कहने की जरुरत नहीं, चित्रकार देवाशीष देव ने कहानियों और आवरण के लिए आकर्षक शैली में चित्र बनाये हैं, जो बाल-किशोरों को लुभायेंगे।

हाँ, एक और बात— किताब के साथ एक छोटा-सा नोटपैड भी उपहार के रूप में मिला है। नोटपैड के आवरण पर भी किताब के आवरण चित्र को छापा गया है।

चित्रकार ने अपने चित्रांकन में हुका-काशी को 40-45 के अधेड़ के रूप में चित्रित किया है। हम ऐसा नहीं करेंगे। हम जब इन कहानियों का अनुवाद पेश करेंगे, तो हम हुका-काशी को चुस्त-दुरुस्त जासूस के रूप में पेश करेंगे, उम्र उनकी ज्यादा-से-ज्यादा पैंतीस रखेंगे। फिलहाल चैट जीपीटी से हमने एक चित्र बनवा भी लिया है।

समग्र की पाँचों कहानियाँ पढ़ चुके हैं, अब तीन उपन्यासों की बारी है। ‘पद्मराग’ उपन्यास शुरू किये हैं, रहस्य की शुरुआत हो चुकी है, अभी तक लेकिन हुका-काशी का प्रवेश नहीं हुआ है। अभी कहानी में रणजीत का जिक्र है। रणजीत हुका-काशी के सहयोगी हैं।

हुका-काशी के 3 उपन्यास: 1. पद्मराग, 2. घोष चौधरी की घड़ी और 3. सोने का हिरण

हुका-काशी की 5 कहानियाँ: 1. हीरक रहस्य, 2. तेरह नम्बर मकान का रहस्य, 3. शान्तिधाम की अशान्ति, 4. संसक्तपुर का रहस्य और 5. चण्डेश्वरपुर का रहस्य

—जयदीप शेखर, 23 अगस्त, 2026 (फेसबुक पर)

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वेबसाइट को फिर खोला गया

जगप्रभा की ई’पुस्तकों को अमेजन पर उपलब्ध कराने के बाद इस वेबसाइट को बन्द कर दिया गया था। आज इसे फिर से खोला गया। अब ऐसा है कि ई’पुस्तकों के आवरण चित्रों पर क्लिक करने आपको अमेजन पर ले जाया जायेगा, जहाँ आप ई’पुस्तकों को खरीद सकते हैं। आप चाहें, तो अमेजन किण्डल की मासिक सदस्यता लेकर इन ई’पुस्तकों को मुफ्त में भी पढ़ सकते हैं।

-जयदीप शेखर, 21 जनवरी, 2026

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लालू की तीन शरारतें

एक लम्बे अरसे के बाद जगप्रभा पर एक ई’पुस्तक जोड़ी जा रही है- “लालू की शरारतें।” बँगला के सर्वश्रेष्ठ लेखक माने जाने वाले शरत् चन्द्र चट्टोपाध्याय की लिखी लालू की तीन कहानियाँ इसमें शामिल हैं।

पिछले कुछ समय से हम “बनफूल” की 30 कहानियों के अनुवाद में लगे हुए थे। वह काम पूरा हुआ। अब मेरे पास बनफूल की 100 कहानियों का अनुवाद मौजूद हो गया है। हमने एक बड़े प्रकाशक को यह बताते हुए सम्पर्क किया। उनसे “डाना” का भी जिक्र किया। उन्होंने रुचि दिखायी तो है, पाण्डुलिपियाँ उन्हें भेज भी दी गयी हैं, अब आगे देखा जाय।

इस काम के बाद हमें जगप्रभा के काम में लगना था, लेकिन उसी समय लखनऊ से एक फोन आया कि बाल-किशोर कहानियों का एक बड़ा संग्रह तैयार किया जा रहा है, जिसमें देश की विभिन्न भाषाओं से भी कुछ बाल-किशोर कहानियाँ शामिल रहेंगी। मुझसे बँगला से 5 कहानियों का अनुवाद भेजने के लिए कहा गया। हमने शरत् चन्द्र चट्टोपाध्याय, विभूतिभूषण बन्द्योपाध्याय, राजशेखर बसु (परशुराम), सुकुमार राय और हेमेन्द्र कुमार राय की एक-एक बाल-किशोर कहानियों का अनुवाद करके उन्हें भेज दिया। इसमें शरत् चन्द्र रचित लालू की दूसरी कहानी हमने उन्हें भेजी। तभी हमें ध्यान आया कि क्यों न बँगला के सर्वश्रेष्ठ लेखक की एक ई’पुस्तक जगप्रभा पर भी हो। तो लगे हाथ हमने लालू की बाकी दोनों कहानियों का भी अनुवाद कर डाला और इस तरह से लालू की तीनों कहानियों को एक ई’पुस्तक के रूप में प्रस्तुत कर दिया।

-जयदीप

25.09.2024

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‘वीरान टापू का खजाना’- ‘साहित्य विमर्श’ पर

जैसा कि बताया जा चुका है, ‘जगप्रभा’ की कुछ ई’पुस्तकों को ‘साहित्य विमर्श’ द्वारा मुद्रित पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है; उसी कड़ी में ‘वीरान टापू का खजाना’ उनकी ओर से प्रकाशित हो चुका है।

यह बिभूतिभूषण बन्द्योपध्याय द्वारा रची एक साहसिक गाथा है। बँगला लेखक बिभूतिभूषण बन्द्योपध्याय के प्रति हम हिन्दीभाषियों की आम धारणा क्या है? सामाजिक उपन्यासों के एक लेखक की। हम बस उन्हें “पथेर पाँचाली” के लेखक के रूप में जानते हैं; लेकिन ऐसा नहीं है। उन्होंने उच्चस्तरीय साहसिक गाथाएं और परालौकिक कहानियाँ भी लिखी हैं। उन सबका हिन्दी अनुवाद कर हम हिन्दीभाषियों के बीच बनी उनकी छवि को एक नया दृष्टिकोण देना चाहते हैं।

साहसिक गाथाओं की “त्रयी” पूरी हो गयी। पहली गाथा- “चाँद का पहाड़”, दूसरी गाथा- “सुन्दरबन में सात साल” और अब तीसरी साहसिक गाथा- “वीरान टापू का खजाना” भी प्रकाशित हो गयी। ये विश्वस्तरीय साहसिक गाथाएं हैं। किशोरों-नवयुवाओं के लिए must-read हैं। इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि हिन्दीभाषी अब तक इनसे अनजान थे!

कहानी की पृष्ठभूमि है— सुलू सागर! हममें से कितने परिचित हैं इससे? बहुत कम। बोर्नियो और फिलीपीन्स द्वीपसमूह के बीच यह सागर है। इसके उत्तर में दक्षिणी चीन सागर है और दक्षिण में सुलावेसी सागर। आज से 40-50 साल पहले इसे रहस्यमयी सागर माना जाता था। यहाँ बहुत सारे ऐसे द्वीप हैं, जो घने जंगलों से ढके हुए हैं।

ऐसे ही एक द्वीप में है, 9वीं सदी, या शायद इससे भी पहले की एक नगरी के ध्वंसावशेष और उनके बीच छुपा है एक खजाना। मनीला के जुए के अड्डे के एक अन्धेरे कमरे में मरणासन्न दक्षिण-भारतीय बूढ़ा नाविक नटराजन— जो कभी समुद्री लुटेरा रह चुका होता है— अपनी काँपती आवाज में यह बात जहाज के एक खलासी जमातुल्ला को बताता है। कुछ समय बाद जमातुल्ला कोलकाता में सुशील को यह बात बताता है। सुशील अपने ममेरे भाई सनत और जमातुल्ला को साथ लेकर निकल पड़ता है उस अनजाने टापू की खोज में। दूसरी तरफ, एक गुप्त संगठन है, जो इस ‘पवित्र’ खजाने की रक्षा के लिए मलय “बोलो” (बड़े हँसुए-जैसा हथियार) से किसी का भी सिर धड़ से अलग कर देने के लिए उद्यत रहता है। इस कारण सिंगापुर में वे अपने दल में शामिल करते हैं पूर्व जलदस्यु यार हुसैन को उसके कुछ शागिर्दों के साथ। इन सबको उस टापू तक पहुँचाता है एक अनुभवी चीनी मल्लाह, अपने “जंक” से। “चीनी जंक” से आप परिचित हैं?

कुल-मिलाकर, एक रोमांचक दास्तान। पढ़ा जाय और बिभूतिभूषण-जैसे महान लेखक के सामने नतमस्तक हुआ जाय ऐसी उच्चस्तरीय साहसिक गाथाएं लिखने के लिए!

साहित्य विमर्श पर “वीरान टापू का खजाना”: https://www.sahityavimarsh.in/veeraan-tapu-ka-khazana/