अनुवाद: एक स्वतंत्र विधा
(यह आलेख वास्तव में “बनफूल” के वृहत् उपन्यास “डाना” के हिन्दी अनुवाद के लिए बँगला साहित्य के लब्धप्रतिष्ठित समालोचक एवं पूर्व प्राचार्य डॉ. कृष्ण गोपाल रॉय द्वारा लिखी गयी ‘प्रस्तावना’ है।)
अनुवाद कोई आसान काम नहीं है। न ही कम है इसका उत्तरदायित्व।
ऐसे हमारे बीच आज भी कुछ लोग रह गये हैं, जो अनुवाद को हेय दृष्टि से देखते हैं; सोचते हैं, कोई भी इन्सान इसे आसानी से कर सकता है और चूँकि यह मौलिक कृति या शोध नहीं है, इसलिए इसका कोई खास महत्व भी नहीं है।
बात दरअसल विपरीत है। हमारे रामायण-महाभारत अबुल फजल द्वारा, या उपनिषद शाहजहाँ-सुपुत्र दारा शिकोह द्वारा फारसी भाषा में अनूदित होकर फ्राँस होते हुए अगर यूरोप न पहुँचते, अभिज्ञान शकुन्तलम से लेकर संस्कृत ध्रुपद साहित्यकृतियाँ अगर अनुवाद के माध्यम से नहीं पहुँचती विश्व के कोने-कोने में, अथवा अरस्तू की कृतियाँ विलियम ऑफ मोयेरबेक द्वारा लैटिन में और फिर लैटिन से बायवाटर आदि अनुवादकों के द्वारा अँग्रेजी में अनूदित न होतीं, बेंजामिन जोवेट अगर प्लेटो का अनुवाद नहीं करते अँग्रेजी भाषा में, तो इन किताबों में छिपी सम्पदा से हम अधिकांश विश्ववासी वंचित ही रह जाते आज तक। अतः अनुवाद का कोई विकल्प नहीं है। यह अपने आप में एक स्वतंत्र विधा है।
वास्तव में, किसी सामाजिक, व्यवसायिक अथवा विज्ञान-विषयक शोधपत्र या लेख के अनुवाद और किसी साहित्यिक कृति के अनुवाद में बहुत अन्तर होता है। साहित्य में शब्दों के शब्दार्थ से ज्यादा महत्व होता है उसके भावार्थ का- खासकर, कविता में। उपन्यास, नाटक या छोटी कहानी में भी भावार्थ की प्रधानता होती है, परन्तु वर्णन में कुछ हद तक सीधा संवाद ही रह जाता है, जहाँ भावार्थ किंचित् शिथिल होता है, इसलिए कविता का अनुवाद करना कठिनतर होता है और इसलिए अनुवादक को पहले ही तय कर लेना पड़ता है कि वह भावात्मक अनुवाद करेगा या शब्दात्मक। उपन्यास, नाटक या कहानी के अनुवादकों को अक्सर दोनों ही करना पड़ता है, क्योंकि वस्तुनिष्ठता के साथ-साथ यहाँ कविता-जैसे मायामय विषय भी होते हैं। इतना ही नहीं, नाटक तथा उपन्यासादि कथा-साहित्य में बहुत ऐसी लोकोक्ति, रुचि, अभ्यास, आचरण, खान-पान, रहन-सहन, घर-गृहस्थी के सामान इत्यादि का जिक्र रहता है, जो किसी विशेष मानव समुदाय की पहचान होती है। अनुवाद के माध्यम से जब इन्हें दूसरे भाषा समुदाय के रसास्वादन के लिए परोसा जाता है, तो वे इनका आनन्द ले पायेंगे या नहीं, यह भी सोचना पड़ता है अनुवादक को। उसके विचार को सारा समुदाय स्वीकार करेगा या नकार देगा, इसकी निष्पत्ति जल्द नहीं होती। एक अनुवादक को इन्हीं द्विधाओं से गुजरना पड़ता है।
मानव समुदायों को एक दूसरे से परिचित कराने वाले इन कलाकारों के सामने कोई सुनिश्चित सफलता भी नहीं होती।
जयदीप शेखर अपनी धरती के एकलव्य हैं। एकान्त में चल रही है इनकी साधना- आत्ममग्न, परमताभिलाषी। अपनी उपलब्धियों को हर पल अतिक्रम करती है इनकी शब्द-यात्रा। ऐसा नहीं है कि वे केवल अनुवाद का काम ही कर रहे हैं। ‘नाज-ए-हिन्द सुभाष’ इनकी सुभाष चन्द्र बोस पर भी लिखी हुई शोधमूलक विख्यात रचना है। बराबर वे आलेखादि लिखते हैं सामाजिक एवं आँचलिक विषयों पर। परन्तु अनुवाद ही इनकी पहली पसन्द है। विभूतिभूषण वन्द्योपाध्याय, बनफूल, सत्यजीत राय आदि की बहुत सारी किताबों का सफल अनुवाद ये कर चुके हैं। ‘डाना’ भी बनफूल का ही एक अनोखा उपन्यास है। न केवल भावानुवाद, न केवल शब्दानुवाद, बल्कि कमोबेश दोनों ही प्रक्रिया इन्होंने अपनायी है इस अनुवाद में, जिससे कि रचना रोचक और मनोग्राही हो उठी है।
इतावली भाषा में एक कथन प्रचलित है, जो इस प्रकार से हैः ‘अनुवाद रमणी-जैसी है, सुन्दर है तो विश्वस्त नहीं, और विश्वस्त है तो निश्चित कुरूपा।’ जयदीप का अनुवाद, मुझे लगा, इस कथन को झुठलाता है। यह सुन्दर भी है और विश्वस्त भी।
पाठकों से इसे प्राप्य है बेहद प्यार।
-डॉ. कृष्ण गोपाल रॉय
आलोचक एवं अवकाशप्राप्त प्राचार्य
कोलकाता- 700025
पुनश्च
[अनुवादक द्वारा किये गये उपन्यास के ‘पुनर्समापन’ पर, जो कि उपन्यास के अन्त में है]:
जयदीप,
तुम्हारा लेखन अद्भुत है। लिखने की ऐसी क्षमता होने पर स्वयं ही कहानी या उपन्यास लिखा जा सकता है और वह निश्चित रूप से पाठकों को पसन्द आयेगा।
प्रश्न है कि यह उपसंहार (‘पुनर्समापन’) उचित है कि नहीं।
उपन्यास की छह विशेषताओं में से एक है लेखक की ‘फिलोसॉफी ऑव लाईफ’, अर्थात् जीवन के बारे में लेखक की विशेष उपलब्धि, जिसे वे इस उपन्यास के माध्यम से बताना चाहते हैं। तुम्हारे द्वारा किया गया उपसंहार लेखक की ‘फिलोसॉफी ऑव लाईफ’ से नहीं मेल खायेगा। इस लिहाज से, आपत्ति बनती है। लेकिन तुमने जो ऑप्शन दे रखा है कि पाठक चाहे, तो (‘पुनर्समापन’ को) नहीं भी पढ़ सकते हैं, इससे लेखक की निजता का हनन नहीं होता है।
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